श्रीडूंगरगढ़ टुडे 18 मई 2026
श्री रामायण प्रचार मण्डल उधना सूरत द्वारा आयोजित आशा नगर उधना सूरत में चल रही श्रीमद भागवत कथा में सोमवार 18 मई को दूसरे दिन की कथा में कथा वाचक संदीप महाराज ने भीष्म स्तुति का वर्णन किया। भीष्म ने अपनी बुद्धि रूपी कन्या का विवाह भगवान कृष्ण के साथ किया। भीष्म छः महीने तक बाणों की शय्या पर पड़े रहे और सूर्य जब उत्तरायण हुए तो अपने प्राणों का त्याग किया। भगवान कृष्ण ने भुआ कुन्ती से कुछ मांगने को कहा, बुआ कुन्ती ने भगवान से कुछ नहीं मांगा। भगवान ने कहा कुछ तो मांगो, तो कुंती ने भगवान से कुछ नहीं मांगा और कहा, देना ही है तो दुख दे दो। दुख दोगे तो बारंबार याद आओगे और सुख दे दिया तो मैं आपको भूल जाऊंगी। इसके उपरांत युधिष्ठिर और पांडव स्वर्ग को गए।

जब परीक्षित राजा बने उनके राज्य में कोई दुखी नहीं रहता था। एक बार राजा परीक्षित वन में गए वहां काला सा पुरुष मिला, उसने कहा मैं कलि हूँ उस कलयुग को चार जगह स्थान दिया सोने में, हिंसा में, मदिरा में, जुए में। सोने का मुकुट पहनकर जब राजा परीक्षित शिकार करने गए तो तपस्या कर रहे श्रृंगी ऋषि के ऊपर मरा हुआ सांप डाल दिया। खेलते हुए ऋषि पुत्र आया उसने अपने पिता के ऊपर मरा हुआ सांप देखकर श्राप दिया कि यही सर्प जिंदा होकर उसी को डसेगा जिसने मेरे पिता के गले में सांप डाला है।

राजा परीक्षित को जब पता चला कि मुझे श्राप लगा है तो राजा परीक्षित अपनी पत्नी के साथ गंगा किनारे आए उसी समय सुखदेव जी का आगमन हुआ और उन्होंने राजा परीक्षित को भागवत कथा सुनायी जिससे राजा परीक्षित की मुक्ति हुई।


