श्रीडूंगरगढ़ टुडे 15 मार्च 2026
जय श्री गणेशाय नमः
जय श्री कृष्णा
🕉️ आज का पंचांग 🕉️
📅 पञ्चाङ्ग 15 मार्च 2026
📆 दिन – रविवार
📜 कल्प _ श्वेत-वराह
👑 मन्वंतर _ वैवस्वत
⏳ युग _ कलियुग (28वाँ चतुर्युग – प्रथम चरण)
📜 विक्रम संवत – 2082 सिद्धार्थी
📜 शाक संवत – 1947
☀️ सूर्यायन – उत्तरायण
🌸 ऋतु – बसंत
🗓️ मास – चैत्र
🌘 पक्ष – कृष्ण
🗓️ तिथि – एकादशी 09:16 तक, तत्पश्चात द्वादशी
⭐ नक्षत्र – श्रवण अगली सुबह 05:56 तक, तत्पश्चात घनिष्ठा
✨ योग – परिध 10:25 तक, तत्पश्चात शिव
🔹 करण – बालव 09:16 तक, तत्पश्चात कौलव
🌙 चन्द्र राशि – मकर
☀️ सूर्य राशि – मीन
⏳ राहुकाल – शाम 04:56 से 06:25:36 तक
🌅 सूर्योदय – 06:41
🌇 सूर्यास्त – 06:26
🧭 दिशाशूल – पश्चिम दिशा में
🎊 व्रत पर्व विवरण – पापमोचिनी एकादशी व्रत, संक्रांति पुण्य काल, शुक्र रेवती में, द्विपुष्कर योग
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रविवार के शुभाशुभ_मुहूर्त
⚠️ राहुकाल – 04:56 से 06:25
⚠️ यमगण्ड – 12:35 से 14:04
⚠️ गुलिक काल – 15:33 से 17:02
✅ अभिजित मुहूर्त – 11:50 से 12:35
⛔ दूरमुहूर्त – 10:58 से 11:00
दिनका चौघड़िया
⚠️ उद्वेग 06:41 – 08:08 (अशुभ)
✅ चर 08:08 – 09:37 (शुभ)
✅ लाभ 09:37 – 11:06 (शुभ)
✨ अमृत 11:06 – 12:35 (अति शुभ)
⚠️ काल 12:35 – 02:04 (अशुभ)
✅ शुभ 02:04 – 03:32 (शुभ)
⚠️ रोग 03:32 – 05:01 (अशुभ)
⚠️ उद्वेग 05:01 – 06:30 (अशुभ)
रात का चौघड़िया
✅ शुभ 06:30 – 08:01
✨ अमृत 08:01 – 09:32
✅ चर 09:32 – 11:03
⚠️ रोग 11:03 – 12:34
⚠️ काल 12:34 – 02:05
✅ लाभ 02:05 – 03:36
⚠️ उद्वेग 03:36 – 05:07
✅ शुभ 05:07 – 06:40
नोट–दिन व रात्रि के चौघड़िया का आरंभ
क्रमशः सूर्योदय एवं सूर्यास्त से होता है।
⏳ प्रत्येक चौघड़िया की अवधि — डेढ़ घंटा होती है।
चर में चक्र चलाइये, उद्वेगे थलगार।
शुभ में स्त्री श्रृंगार करे, लाभ में करो व्यापार॥
रोग में रोगी स्नान करे, काल करो भण्डार।
अमृत में काम सभी करो, सहाय करो कर्तार॥
दिन का होरा
☀️ सूर्य 06:41 – 07:41
💎 शुक्र 07:41 – 08:41
🧠 बुध 08:41 – 09:41
🌙 चन्द्र 09:41 – 10:41
🪐 शनि 10:41 – 11:41
📿 गुरु 11:41 – 12:41
🔥 मंगल 12:41 – 13:41
☀️ सूर्य 13:41 – 14:41
💎 शुक्र 14:41 – 15:41
🧠 बुध 15:41 – 16:41
🌙 चन्द्र 16:41 – 17:41
🪐 शनि 17:41 – 18:41
रात का होरा
📿 गुरु 18:41 – 19:41
🔥 मंगल 19:41 – 20:41
☀️ सूर्य 20:41 – 21:41
💎 शुक्र 21:41 – 22:41
🧠 बुध 22:41 – 23:41
🌙 चन्द्र 23:41 – 24:41
🪐 शनि 24:41 – 01:41
📿 गुरु 01:41 – 02:41
🔥 मंगल 02:41 – 03:41
☀️ सूर्य 03:41 – 04:41
💎 शुक्र 04:41 – 05:41
🧠 बुध 05:41 – 06:40
✨ दैनिक राशिफल ✨
देशे ग्रामे गृहे युद्धे
सेवायां व्यवहारके।
नामराशेः प्रधानत्वं
जन्मराशिं न चिन्तयेत्।।
विवाहे सर्वमाङ्गल्ये
यात्रायां ग्रहगोचरे।
जन्मराशेः प्रधानत्वं
नामराशिं न चिन्तयेत्।।
♈ मेष राशि-आज का दिन सामान्य रहेगा। कार्यक्षेत्र में मेहनत का फल मिलेगा। परिवार का सहयोग मिलेगा। धन खर्च थोड़ा बढ़ सकता है।
♉ वृषभ राशि-आज भाग्य का साथ मिलेगा। रुके हुए काम पूरे हो सकते हैं। व्यापार में लाभ के संकेत हैं। किसी शुभ समाचार की प्राप्ति हो सकती है।
♊ मिथुन राशि-आज थोड़ा संयम रखने की आवश्यकता है। वाणी पर नियंत्रण रखें। स्वास्थ्य का ध्यान रखें और अनावश्यक विवाद से दूर रहें।
♋ कर्क राशि-आज दांपत्य जीवन में मधुरता बढ़ेगी। साझेदारी के कार्यों में सफलता मिल सकती है। आर्थिक स्थिति में सुधार होगा।
♌ सिंह राशि-आज कामकाज में व्यस्तता बढ़ सकती है। शत्रु पक्ष कमजोर रहेगा। स्वास्थ्य के मामले में थोड़ी सावधानी रखें।
♍ कन्या राशि-आज का दिन शुभ रहेगा। विद्यार्थियों के लिए अच्छा समय है। प्रेम संबंधों में मधुरता आएगी और मन प्रसन्न रहेगा।
♎ तुला राशि-घर-परिवार के कार्यों में समय व्यतीत होगा। माता का सहयोग मिलेगा। भूमि या वाहन से जुड़े कार्य बन सकते हैं।
♏ वृश्चिक राशि-आज साहस और आत्मविश्वास बढ़ेगा। छोटे-छोटे प्रयासों से भी सफलता मिल सकती है। मित्रों से सहयोग मिलेगा।
♐ धनु राशि-धन लाभ के योग बन सकते हैं। परिवार में सुख-शांति बनी रहेगी। वाणी के प्रभाव से कार्य सिद्ध होंगे।
♑ मकर राशि-आज आत्मविश्वास बढ़ेगा। नई योजनाओं पर काम शुरू कर सकते हैं। सामाजिक मान-सम्मान बढ़ सकता है।
♒ कुंभ राशि-आज खर्च अधिक हो सकता है। मानसिक तनाव से बचें। धार्मिक कार्यों में मन लगेगा और आध्यात्मिक लाभ मिलेगा।
♓ मीन राशि-आज आय के नए स्रोत बन सकते हैं। मित्रों से लाभ मिलेगा। मन में प्रसन्नता रहेगी और योजनाएं सफल होंगी।
🌼 पापमोचनी एकादशी 2026 – व्रत विधि, महत्व और पूरी पौराणिक कथा 🚩
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नास्ति चैकादशीतुल्यं
व्रतं त्रैलोक्यविश्रुतम्।
तपो नाशनात् तुल्यं
नास्ति मातृसमो गुरुः॥
अर्थात् —
त्रिलोक में एकादशी के समान प्रसिद्ध कोई व्रत नहीं, अनशन से बढ़कर कोई तप नहीं और माता के समान कोई गुरु नहीं होता।
शास्त्रों के अनुसार एकादशी सबसे श्रेष्ठ एवं सर्वाधिक पुण्यदायी व्रत माना गया है। इस दिन चावल और दाल का सेवन वर्जित बताया गया है, इसलिए एकादशी के दिन इनका त्याग करना चाहिए।
एकादशी तिथि आनन्द देने वाली और शुभ फल प्रदान करने वाली मानी जाती है। इस दिन प्रातः सूर्योदय से पहले स्नान करना चाहिए तथा स्नान के जल में आँवला या आँवले का रस मिलाकर स्नान करना विशेष पुण्यदायक माना गया है।
शास्त्रों में पापमोचनी एकादशी का अत्यंत अधिक महत्व बताया गया है। यह एकादशी अन्य एकादशियों की तुलना में अत्यन्त विशेष फलदायी मानी जाती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी पापों का नाश करने वाली होती है। ऐसा कहा जाता है कि इस एकादशी का महात्म्य स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया था।
इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इस दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत विधि-विधान से करता है, उसके जीवन में शुभ फलों की वृद्धि होती है।
🌼 पापमोचनी एकादशी व्रत विधि 🌼
पापमोचनी एकादशी के व्रत में भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा की जाती है।
व्रती को दशमी तिथि को केवल एक बार सात्विक भोजन करना चाहिए।
मन से भोग-विलास की भावना त्यागकर भगवान विष्णु का ध्यान करना चाहिए।
एकादशी के दिन प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लेना चाहिए।
संकल्प के बाद भगवान विष्णु की पूजा, दीप, धूप, पुष्प, नैवेद्य आदि से आराधना करनी चाहिए।
पूजा के बाद भगवद् कथा का पाठ या श्रवण करना चाहिए।
शास्त्रों में कहा गया है कि एकादशी की रात्रि में जागरण करने से कई गुना पुण्य प्राप्त होता है। इसलिए रात्रि में भजन-कीर्तन और भगवान के स्मरण के साथ जागरण करना चाहिए।
द्वादशी के दिन प्रातः स्नान करके पुनः भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। इसके पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा सहित विदा करना चाहिए और उसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए।
पापमोचनी एकादशी चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी को आती है और शास्त्रों में इसे अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है।
🌼 पापमोचनी एकादशी व्रत कथा 🌼
प्राचीन काल में धनपति कुबेर का चैत्ररथ नाम का अत्यंत सुंदर पुष्पों का एक विशाल उपवन था, जहाँ सदा वसंत ऋतु का वातावरण बना रहता था। वहाँ गंधर्व, किन्नर और अप्सराएँ विहार किया करते थे। इंद्रादि देवता भी वहाँ आकर क्रीड़ा करते थे।
उसी उपवन में भगवान शिव के परम भक्त मेधावी ऋषि तपस्या किया करते थे। वे च्यवन ऋषि के पुत्र थे।
उनकी कठोर तपस्या देखकर देवराज इन्द्र चिंतित हो गए। उन्हें भय हुआ कि यदि मेधावी ऋषि की तपस्या सफल हो गई तो वे इन्द्रपद प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए इन्द्र ने उनकी तपस्या भंग करने का उपाय सोचा।
इन्द्र ने कामदेव और मंजुघोषा नामक अप्सरा को आदेश दिया कि वे किसी प्रकार मेधावी ऋषि की तपस्या भंग करें।
आदेश पाकर दोनों वहाँ पहुँचे, परंतु ऋषि के श्राप के भय से वे सीधे उनके पास नहीं गए। उन्होंने उनके आश्रम से थोड़ी दूरी पर एक कुटिया बना ली और प्रतिदिन वीणा बजाकर मधुर गीत गाने लगे।
सुगंधित पुष्पों और चंदन से अलंकृत होकर मंजुघोषा अप्सरा मधुर स्वर में गाने लगी। कामदेव भी मेधावी ऋषि को मोहित करने का प्रयत्न करने लगा।
अंततः कामदेव ने मेधावी ऋषि के मन में प्रवेश कर लिया, जिससे ऋषि का मन विचलित हो गया। मंजुघोषा के रूप और संगीत से प्रभावित होकर वे उसके वश में हो गए और अपनी तपस्या तथा साधना भूल गए।
वे उसके साथ हास-परिहास और विषय-विलास में लीन हो गए। इस प्रकार 57 वर्ष, 9 महीने और 3 दिन बीत गए, परंतु ऋषि को वह समय केवल एक रात्रि के समान प्रतीत हुआ।
जब मंजुघोषा ने देखा कि उसका उद्देश्य पूरा हो गया है, तो उसने वापस जाने की अनुमति मांगी।
ऋषि बोले —
“हे प्रिय! तुम तो अभी कल ही आई थीं, इतनी जल्दी क्यों जा रही हो?”
तब अप्सरा ने कहा —
“हे मुनिवर! आपके साथ रहते हुए 57 वर्ष, 9 महीने और 3 दिन बीत चुके हैं।”
यह सुनकर मेधावी ऋषि को अपनी भूल का बोध हुआ। उन्हें अत्यंत पश्चाताप हुआ और क्रोध में उन्होंने मंजुघोषा को पिशाचिनी होने का श्राप दे दिया।
भयभीत होकर मंजुघोषा ने क्षमा याचना की।
तब मेधावी ऋषि बोले —
“मैं अपना श्राप वापस नहीं ले सकता, परंतु तुम्हें मुक्ति का उपाय बताता हूँ। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से तुम्हें इस श्राप से मुक्ति मिल जाएगी।”
इसके बाद मेधावी ऋषि अपने पिता च्यवन ऋषि के आश्रम पहुँचे। उन्होंने अपने पुत्र को पतित देखकर दुःख व्यक्त किया और कहा कि पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
पिता के उपदेश से मेधावी ऋषि ने पापमोचनी एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से उनके सभी पाप नष्ट हो गए और वे पुनः पुण्यात्मा बन गए।
उधर मंजुघोषा ने भी यह व्रत किया और पिशाचिनी योनि से मुक्त होकर पुनः दिव्य रूप प्राप्त कर स्वर्ग चली गई।
अंत में लोमश ऋषि ने राजा मान्धाता से कहा —
“हे राजन! पापमोचनी एकादशी का व्रत और इसका महात्म्य सुनने से भी महान पुण्य प्राप्त होता है। इस व्रत के पालन से हजार गौदान के समान फल मिलता है। इससे ब्रह्महत्या, भ्रूणहत्या, मदिरापान और गुरु-पत्नी गमन जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं।
अतः सभी मनुष्यों को इस महान पापमोचनी एकादशी व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन अवश्य
करना चाहिए।




