श्रीडूंगरगढ़ टुडे 10 अक्टूबर 2025
करवा चौथ व्रत का इतिहास पौराणिक कथाओं से जुड़ा है, जिसमें एक कथा के अनुसार देव दानव युद्ध के दौरान देवताओं की पत्नियों ने अपने पतियों की रक्षा और लम्बी आयु के लिए करक चतुर्थी का व्रत किया था, जिसके बाद युद्ध में विजय मिली। एक अन्य कथा देवी पार्वती से जुड़ी है, जिन्होंने भगवान शिव के लिए यह व्रत रखा था। एक अलग कहानी एक पतिव्रता करवा की है, जिसने मगरमच्छ से अपने पति को बचाने के लिए अपने सतीत्व के बल का उपयोग किया था। कुछ मान्यताओं के अनुसार, यह त्योहार फसल के मौसम के अंत को भी दर्शाता है और उन दिनों महिलाओं के लिए ससुराल में अकेलेपन को दूर करने और सामाजिक जुड़ाव बनाने का एक साधन भी था।
करवा चौथ का महत्त्व –मान्यता है कि करवा चौथ का व्रत पूरे विधि विधान से करने पर पति को दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है। यह व्रत पति-पत्नी के रिश्तों को मजबूत बनाता है और घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है।इसे अखंड सौभाग्य का प्रतीक भी माना गया है।
करवा चौथ प्रेम तपस्या, समर्पण का त्योहार है, जो विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु, सुखी दाम्पत्य जीवन और अखण्ड सौभाग्य के लिए सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला उपवास रखकर मनाया जाता है यह पति-पत्नी के बीच के मजबूत प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। जिसमें पत्नी अपने पति की खुशहाली के लिए कठिन व्रत रखती है और पति भी प्रेम व सम्मान जताता है।
कुछ पंक्तिया-
पति आस है तो पत्नी विश्वास है,
पति घर बनाता है तो पत्नी सजाती है।
पति पत्नी के जीवन का आधार,
पत्नी पति के लिए करती सोलह श्रृंगार।
पति पत्नी दोनों एक दूसरे के पूरक है,
एक कहता नहीं, दूसरा समझ जाता है।
ऐसा विश्ववास ही जीवन भर काम आता है,
पत्नी पति से कन्धे से कन्धा मिलाकर चलती है।
गृहस्थी भी अच्छे से संभालती है,
पति उसके काम की कद्र करता है।
पति के द्वारा ढेर सारा सम्मान भी मिलता है,
दोनों एक ही गाड़ी के दो पहिए,
सामजंस्य के साथ दोनों रहते हैं,
तब ही तो ऐसे मजबूत रिश्ते बनते हैं।
सभी महिलाओं (पत्नियों) के पतियों को सलामत रखना चौथ माता हम पर कृपा दृष्टि बनाए रखना ।।





