श्रीडूंगरगढ टुडे 17 अगस्त 2026
राज्य के राजकीय विद्यालयों में विद्यार्थियों की सुरक्षा, निजता और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने कड़े निर्देश जारी किए हैं। अब किसी भी यूट्यूबर, ब्लॉगर, पत्रकार अथवा अन्य बाहरी व्यक्ति को विद्यालय परिसर में प्रवेश, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, ऑडियो रिकॉर्डिंग, इंटरव्यू या लाइव स्ट्रीमिंग करने से पहले संस्था प्रधान की पूर्व लिखित अनुमति लेना अनिवार्य होगा।
निदेशक माध्यमिक शिक्षा राजस्थान, बीकानेर ललित कुमार द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि राज्य सरकार विद्यालयों में अध्ययनरत बच्चों की सुरक्षा और निजता के प्रति विशेष रूप से उत्तरदायी है। इसी उद्देश्य से विद्यालय परिसरों में बाहरी व्यक्तियों की गतिविधियों को विनियमित करने के लिए यह आदेश जारी किए गए हैं।
आदेश के अनुसार किसी भी बाहरी व्यक्ति को प्रधानाचार्य की अनुमति के बिना विद्यालय परिसर में प्रवेश नहीं मिलेगा। प्रवेश से पहले प्रत्येक आगंतुक को विजिटर रजिस्टर में अपनी जानकारी दर्ज करनी होगी। साथ ही किसी भी आगंतुक को विद्यालय के कक्षा-कक्ष, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, छात्रावास, खेल मैदान, शौचालय या विद्यार्थियों की गतिविधियों वाले क्षेत्रों में बिना अधिकृत अधिकारी की उपस्थिति के जाने की अनुमति नहीं होगी।
नए निर्देशों के तहत विद्यालय परिसर में विद्यार्थियों, शिक्षकों या विद्यालय गतिविधियों की फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, साक्षात्कार, ऑडियो रिकॉर्डिंग अथवा लाइव स्ट्रीमिंग भी संस्था प्रधान की पूर्व लिखित अनुमति के बिना नहीं की जा सकेगी। विद्यालय प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं कि विद्यार्थियों की तस्वीरें, वीडियो अथवा व्यक्तिगत जानकारी इस प्रकार सार्वजनिक न हो जिससे उनकी सुरक्षा, गरिमा या निजता प्रभावित हो।
परिपत्र में यह भी कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति बिना अनुमति विद्यालय में प्रवेश करता है, परिसर छोड़ने से इंकार करता है, अनधिकृत फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी करता है अथवा विद्यालय के कार्य में बाधा उत्पन्न करता है तो प्रधानाचार्य तत्काल स्थानीय पुलिस और जिला शिक्षा अधिकारी को सूचना देंगे। ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता, पॉक्सो अधिनियम, किशोर न्याय अधिनियम, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम सहित अन्य प्रासंगिक कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकेगी।
शिक्षा विभाग के इस निर्णय को विद्यालय परिसरों में अनाधिकृत दखलंदाजी रोकने और बच्चों की निजता एवं सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विभाग ने सभी पर्यवेक्षण अधिकारियों और संस्था प्रधानों को इन निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
मकसद है, स्कूलों की कमियाँ छिपाना
आदेश को शिक्षा विभाग की मनमानी, जर्जर इमारतों, गंदी व्यवस्था और बच्चों की बदहाल स्थिति पर पर्दा डालने का तरीका बताया जा रहा है। अब स्कूल जर्जर है या बच्चे फर्श पर बैठे हैं, सफाई है या नहीं, अभिभावक पता नहीं लगा पाएंगे। पत्रकार रिपोर्टिंग नहीं कर पायेगा।
लोकतंत्र पर हमला
उच्च न्यायालय और बच्चों की निजता की आड़ लेकर जारी इस फरमान को पत्रकारों, आमजन व अभिभावकों के बुनियादी अधिकारों पर कुठाराघात करार दिया गया है।
सजा का प्रावधान
बिना अनुमति प्रवेश या वीडियो बनाने पर प्रधानाचार्य तुरंत पुलिस बुलाकर भारतीय न्याय संहिता के तहत कार्रवाई करवाएंगे। आलोचकों का कहना है कि पारदर्शिता की बात करने वाला विभाग खुद तानाशाही भरा रवैया अपना रहा है।
तो क्या खबरें पूछ कर लगानी होगी
इधर, जानकारों का कहना है कि ऐसे आदेशों से स्कूलों में आए दिन मिड-डे मील में खामियां, जर्जर कक्षा, छात्राओं से अभद्रता जैसे मुद्द खामोश हो जाएंगे। यह अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठाराघात होगा। इतना ही नहीं अन्य विभागों ने यदि इस आदेश का अनुसरण किया तो फिर क्या मीडिया को पूछ कर खबर लगानी पड़ेगी। ऐसे में सच्चाई का दफन होना तय है। इसलिए शिक्षा महकमे को इस आदेश पर एकबारगी विचार करना चाहिए ।




